गरीबी में भी आनंद होता है...
गरीबी में भी आनंद होता है...
"तुम लोग अपना इंतज़ाम कर लो..."
यह शब्द कहते हुए मेरे नाना ने यह तक नहीं सोचा की एक औरत अपने दो छोटे मासूम बच्चों को लेकर अकेले कहाँ रहेगी... ऐसे समाज में वह कहाँ जाएगी... मगर मेरी माँ हिम्मत, ताकत की मूरत थी... उन्होंने एक छोटे से किराये के कमरे में अपनी गृहस्ती बसा ली... जिसका किराया शायद ५०० या ७०० रूपया महीना था... उस छोटे से तहख़ाने जैसे कमरे में न जाने माँ ने और मैंने ज़िन्दगी के कितने साल बीता दिए...
सच में नाना-नानी किसी ज़ालिम से कम नहीं थे... निर्दय लोग...
मगर ख़ुशी थी, वहाँ भी सुख था, शांति थी... हम सब साथ-साथ रहते थे... उस गरीबी में भी अपना एक सुकून, एक आनंद था...
मेरी माँ ने फिर भी नाना-नानी का हमेशा उनका आदर-सम्मान करना सिखाया...
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