ग़रीबी में भी आनंद होता है...
ग़रीबी में भी आनंद होता है...
मुझे यह कहने में कोई शर्म नहीं आती, मेरे नाना-नानी किसी ज़ल्लाद से काम नहीं थे... हम ननिहाल में ही पले-बढ़े.
मुझे एक वाकया आज भी याद है... माँ रात में आलू-मटर-पुलाव बनाने रसोई में गई... नानी ने बहुत बुरा-भला बोला माँ को और लगातार बोलती रही... माँ ने ग़ुस्से में आँखों में आँसू भरे हुए कुकर को फेंक दिया... और ऊपर कमरे में चली आई... हम ऊपर एक कमरे में माँ के साथ अकेले रहते थे... फिर थोड़ी देर बाद सोचा की बच्चे क्या खाएंगे रात में.... फिर माँ नीचे रसोई में गई और नाना-नानी की गालियाँ, गन्दी बातें सुनते हुए आलू-मटर-पुलाव बनाये... उसे लेकर ऊपर कमरे में आई...
उस आलू-मटर-पुलाव में जो माँ के लिए अपने बच्चों के लिए प्यार था, जो स्नेह, दुलार, अपनापन वह आज पंजतारा होटल के खाने में भी नहीं मिलता...
गरीबी में भी आनंद था, सुकून था, ख़ुशी थी...
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