गरीबी में भी आनंद होता है...
गरीबी में भी आनंद होता है...
मुझे याद है लोकल बेकरी में जो बिस्कुट, रस बनाते समय टूट जाते थे वह थोड़ा सस्ते मिलते है...
वह हमारे तंगी के दिन थे... तोह हम लोकल बेकरी से टूटे हुए रस, बिस्कुट पन्नी में भरकर ले आते थे और चाय के साथ बहुत खाते थे... एक बार में ही सारे के सारे खत्म...
पारले-जी का दौर तो हमारी ज़िन्दगी में थोड़ी देर से आया...
आज सिर्फ दो बिस्कुट चाय के साथ खा ले तो भी बहुत है...
वह गरीबी में भी अपना एक आनंद होता है...
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