सैलरी के टुकड़े फेक कर सोचता है की हर नौकर कुत्ता निकले...
दरख़्त की तन्हाई में खड़ा मैं सोचा करता हूँ...
प्राइवेट नौकरी है, दौलत का घमण्ड उसके सर पर सवार है...
कि ज़िन्दगी के अरमान भी कैसे, किस तरह निकले...
प्राइवेट नौकरी है, दौलत का घमण्ड उसके सर पर सवार है...
सैलरी के टुकड़े फेक कर सोचता है की हर नौकर कुत्ता निकले...
सोचता हूँ, खुद को बेच दूँ...
आशियाना ईमानदार, स्वाभिमान का फूँक दूँ...
शायद यही अल्लाह को मंजूर हो... हम बेवफा ज़िन्दगी के लिए... बेवफा निकले...
- सन
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