मैं, अब्बा और मेरी पहली साइकिल
मैं, अब्बा और मेरी पहली साइकिल
मन में मेरे ख़ुशी के दीप जगमगाये थे
अब्बा मेरे लिए साइकिल लेकर आये थे...
जब मैं गिर जाता तो फिर मुझे उठाते
घुटनों से मेरी मिट्टी छाड़ते
शाम को रोज़ ऐसे सुहाने पल आये थे
अब्बा मेरे लिए साइकिल लेकर आये थे
मन में मेरे ख़ुशी के दीप जगमगाये थे
अब्बा मेरे लिए साइकिल लेकर आये थे...
नन्हे-नन्हे क़दमों से जब मैं पैडल मारता
गोल-गोल जब पहिया घूमता
अब्बा देख-देख मुस्कुराये थे
अब्बा मेरे लिए साइकिल लेकर आये थे... मुझमें हिम्मत भर खुद साइकिल पर बिठाते
साइकिल सीट पकड़े-पकडे पीछे मेरे खूब दौड़ लगाते जब मैं गिर जाता तो फिर मुझे उठाते
घुटनों से मेरी मिट्टी छाड़ते
शाम को रोज़ ऐसे सुहाने पल आये थे
अब्बा मेरे लिए साइकिल लेकर आये थे
आइसक्रीम खाते
साथ-साथ चलते
बातें करते
हाथों से साइकिल का हैंडल पकड़े
कितने पल हमने साथ-साथ बिताये थे
अब्बा मेरे लिए साइकिल लेकर आये थे
मैं और मेरी साइकिल आज भी अब्बा तो याद करते है...
- सनी
Comments
Post a Comment