मन...
मन... क्यों लज्जतों में पड़ा है? कैसे मैं तुझको समझाऊँ?
यह तन जो तेरे साथ उपजाया है यह भी तेरा नहीं है. इसे भी यही संसार में छूट जाना है. हर रिश्ता, हर सुख, धन-दौलत, अपना-पराया, मान-अपमान, यश-कीर्ति सब इसी संसार में छूट जाएगी.
मन... तू क्यों लज्जतों में पड़ा है?
संसार की माया में क्यों फस कर नाचता रहता है? जरा तू सोचकर विचार, इस समाप्त हो जाने वाले ब्रह्मण्ड में कुछ भी तो नहीं है जो तेरे संग रहेगा. तू क्यों नहीं प्रभु सिमरन में लगता है? तू क्यों उसको पाना नहीं चाहता है जो कभी समाप्त नहीं होगा. जितना तू उसमें रमेगा तू रे मन उतना ही उसका होता जायेगा. उस प्रभु के साथ तू भी सदा-सदा जीवत रहेगा.
- Fraud Guru Romil
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