नर्क...

नर्क... जो कुछ है वह इसी पृथ्वी पर है.... जब मृत्युं प्रश्चात आपका शरीर यही पृथ्वी पर जल गया... और गीता में अध्याय २ शलोक २३ में कृष्णा जी "आत्मा" के बारे में कहते है कि "इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता ।। २३ ।।" 

आपका शरीर यही राख हो गया, आत्मा को कुछ कोई कर सकता... फिर नर्क, जहन्नुम की यातनाएँ कैसी? जो दुःख-दर्द, तकलीफ, नरक है वह इसी पृथ्वी पर है... कर्मो के अनुसार मनुष्य को जीवन भोगना पड़ता है...

गरुण पुराण में नर्क का वर्णन अवश्य है... शायद वह कर्मो के महत्व को समझाना चाहते है... अगर इस संसार को भली प्रकार देखे तो इस संसार में कितनी यातनाएँ मनुष्य भोग रहा है.... धन-सम्पदा के बाद भी, मन ही मन ईर्ष्या की लौ में जल रहा है, तड़प रहा है... दूसरों की ख़ुशी, सुख-शांति मनुष्य के मन में काँटों की तरह चूभ रही है... यही नर्क है... 

यह फिलॉसफी है....

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