अमृत...

अमृत... मनुष्य जो जीवन-मृत्युं के चक्र में पड़ा रहता है... शायद यह समझाया गया है की देवों ने अमृत... पिया हुआ है, इसलिए भयभीत होने की जरुरत नहीं है...सूर्य, चन्द्र, आकाश, पृथ्वी, इंद्रा, वायु सबने अमृत पिया हुआ है, इसलिए भयभीत होने की जरुरत नहीं है...  डर की आवश्कता नहीं है... निश्चिंत होकर जीवन जियो...

अगर ऐसा नहीं होता तो शायद मनुष्य भयभीत रहता की आज चन्द्र, सूर्य फट जायेंगे और सब मृत्युं को प्राप्त हो जायेंगे, शायद इसी भय को खत्म करने के लिए अमृत पिलाने की बात कही गई है...

मनुष्य, भय से ही दूसरी दुनिया में जीवन को सोचने लगता है... मंगल, चन्द्र या अन्य ग्रह में जीवन तलाश करने लगता है...  

शायद इसी भय को खत्म करने के लिए यह समझाया गया है की ४०००-५००० बरसों से सूर्य, चन्द्र, आकाश, पृथ्वी, इंद्रा, वायु सब अपना कार्य कर रहे है सबने अमृत पिया हुआ है...

यह फिलॉसफी है...

या यह कह सकते है की जब मंथन किया जाता है तो जीवन मिलता है, नया रास्ता मिलता है, नया विचार उत्पन्न होता है... देव-दानव दोनों शत्रु... अगर शत्रु भी मंथन करे तो अमृत प्राप्त कर सकते है, नया जीवन प्राप्त कर सकते है... एक दूसरे से लड़-झगड़ कर शक्ति बर्बाद करने से अच्छा है कि मंथन करके नया जीवन खोजें... 

सच तो है सब एक निश्चित अवधि के लिए है... प्रकृति थी, प्रकृति है और प्रकृति हमेशा रहेगी...    

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