"जैसे चाहता है, वैसे ही कर
बड़ा ही रोचक है यह की पूरी गीता कहने के बाद जब कृष्णा जी, अर्जुन से १८ चैप्टर के ६३वें श्लोक में यह कहते है कि "इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया । अब तू इस रहस्य युक्त्त ज्ञान को पूर्णतया भली-भाँति विचार कर जैसे चाहता है, वैसे ही कर ।। ६३ ।।"
फिलॉसफी में जब इसको समझा जाता है की "जैसे चाहता है, वैसे ही कर"
कर्म तुम्हारे है और तुमको ही करने है.... इसका जो भी फल होगा वह तुमको ही भोगना है, जो भी इसका एक्शन-रिएक्शन होगा तुमको ही भोगना पड़ेगा... आप अपने कर्मो के लिए किसी दूसरों को इल्ज़ाम नहीं लगा सकते
... यह मायाजाल है, कर्मो का जाल है
... इससे बचाना मुश्किल है
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