भूलता लाख हूँ मगर याद आ जाता है...
भूलता लाख हूँ मगर याद आ जाता है...
तमाशा बनाकर छोड़ गया कोइए...
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न कोइए दुश्मनी थी, न कोइए रंजिश थी
फिर भी इन्तेकाम ले गया कोइए...
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सपना तोह बहुत हसीं था मोहब्बत-ए-जहां का
हकीक़त खुली तो ज़मीन पर गिरा मिला कोइए...
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रहा करता है याद-ए-जहां में सुल्तान की तरह
मगर असल ज़िन्दगी में कलंदर है कोइए...
[RRSA]
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