भूलता लाख हूँ मगर याद आ जाता है...

भूलता लाख हूँ मगर याद आ जाता है...
तमाशा बनाकर छोड़ गया कोइए...
*
न कोइए दुश्मनी थी, न कोइए रंजिश थी
फिर भी इन्तेकाम ले गया कोइए...
*
सपना तोह बहुत हसीं था मोहब्बत-ए-जहां का
हकीक़त खुली तो ज़मीन पर गिरा मिला कोइए...
*
रहा करता है याद-ए-जहां में सुल्तान की तरह
मगर असल ज़िन्दगी में कलंदर है कोइए...
[RRSA]

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