फ़क्र है मुझे अपनी माँ की तालीम पर

फ़क्र है मुझे अपनी माँ की तालीम पर
जिन्होंने मेहनत की दाल-रोटी खाना सिखाया
हराम के मुर्ग़ मुसल्लम नहीं।

इसलिए मैं खुदा से नज़रें मिलाकर बात करता हूँ
कि मुझमें कोई ऐब नहीं। 
 दौलत की चाह नहीं।
मौत का खौफ नहीं।

 मुझे बचपन में कम मार्क्स लाने की चिंता नहीं रहती थी
बल्कि चिंता इस बात की रहती थी कि क्या मैं इतने मार्क्स ला पायूँगा 
कि मुझे स्कॉलरशिप मिल सके।

ज़रा गौर से देखो उसकी तरफ़
उसके बदन पर कोई क़ीमती जेवर नहीं है
न ही महँगे लिबास है
पर
खुदा ने उसको तालीम के जेवरों से नवाज़ा है। 

मैं नौकरी कर रहा हूँ, मेरी मजबूरी है
वोह मुझसे अपनी नौकरी करवा रहा है, उसकी क़िस्मत है
मगर इज़्ज़त बेच दूँ इतना मज़बूर नहीं।

रो+मिल

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