"रोमिल" बचपन के दिन याद आते हैं...

"रोमिल" बचपन के दिन याद आते हैं...
जब माँ, अपने हाथों से उपले थपा करती थी...
धूप में उसे सुखाती थी...
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अक्सर खाने के समय
मेरा दोस्तों के साथ खेलने चले जाना
माँ, का फिर पीछे
डंडी लेकर दौड़ते हुए आना
वोह जोर से चिल्ला कर कहना...
"कमीने, मरजाने" रोटी तो खा ले, फिर खेलते-मरते रहना"
"रोमिल" बचपन के दिन याद आते हैं...
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सूरज रोज़ सुबह हँसते-खेलते हमारे घर आ जाता था
मैं चारपाई पर चादर ओढ़कर सोया-लेटा रहता था
माँ का सर पर हाथ फेरकर मुझे उठाना
वोह प्यार से कहना...
"सूरज-घर आया हैं
सूरज-घर आया हैं
देखो कितनी रोशनी
देखो कितनी खुशियाँ लाया हैं
सूरज-घर आया हैं
सूरज-घर आया हैं"
"रोमिल" बचपन के दिन याद आते हैं...
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रात को जब आँगन में चूल्हा जला करता था
हम सब ज़मीन पर चूल्हा घेरकर रोटी खाते थे
माँ का प्यार से नंगे-नंगे पैरों में
गरम चिमटा मुझे लगाना
और डाँटते हुए कहना...
"दिन भर नंगे-नंगे पाओं घूमते रहते हो
इन पैरों को जला दूंगी"
"रोमिल" बचपन के दिन याद आते हैं...

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