खाली कमरे में नज़रे तुझे ढूँढती है

खाली कमरे में नज़रे तुझे ढूँढती है
कभी चीखती है
कभी पुकारती है
जब तू नज़र नहीं आती है 
फिर माँ थककर रोकर सो जाती है.


आवारा फिरते - फिरते जब मैं थक जाता हूँ
घर की मुंडेरी पर जैसे ही मैं आता हूँ
किवाड़ खटखटाता हूँ
माँ, तेरे न होने का एहसास जब मन में आता है
मैं वापस ही लौट जाता हूँ.


जब कंधों पर यादों की झोली रखकर
भीने-भीने मुस्कुराता हूँ
माँ दीवार पर टंगी तेरी तस्वीर को देखता हूँ
भोले बीते लम्हों में खो जाता हूँ.


आँखें मूँद कर जब मैं भरी धूप में किसी पेड़ की आड़ में लेट जाता हूँ
तेरे आँचल को तरसता हूँ
माँ तेरी ममतामय छवि को सोचता जाता हूँ
और उसमे खो जाता हूँ.
और रोमिल उसमे खो जाता हूँ

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