किस बात की सफाई देना चाहता है वोह

न जाने
किस बात की सफाई देना चाहता है वोह
हमने तोह यह भी नहीं कहाँ गुनेह्गर है वोह.
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वैसे भी
शतरंज सी उलझी है मेरी ज़िन्दगी
दो चालों में ही इश्क की बाज़ी हरा गया वोह.



किताबों के पन्ने को पलट कर सोचता हूँ रोमिल
क्या ज़िन्दगी भी पीछे पलटकर मेरे साथ शुरुकर सकता है वोह.
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और खुद को क्यों इल्ज़ाम देते हो अनजाने सफ़र के साथी
अपनी तबियत ही कुछ ऐसी है कि हर जगह नज़र आता है वोह.

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