लुफ्त भी क्या सर्दिओं के हुआ करते थे - II

 लुफ्त भी क्या सर्दिओं के हुआ करते थे - II   
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 लुफ्त भी क्या सर्दिओं के हुआ करते थे
मक्के कि रोटी संग सरसों का साग खाते थे
आग को तापते हुए जब गज़क, रबड़ी का आनंद लेते थे
रजाई में बैठ कर जब मूंगफली और गुड खाते थे
गरम-गरम गज़र का हलवा जब सबसे छुपा के भागते थे
लुफ्त भी क्या सर्दिओं के हुआ करते थे... 
[written by romil - copyright reserved]


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