इंसान खुद को खुदा समझता हैं...
मुहब्बत में खुमार यूं चढ़ता हैं...
इंसान खुद को खुदा समझता हैं...
मत करो उससे ईमान की बात यारों
जो महबूब के सजदे में सर झुकाए रहता हैं...
मुहब्बत में खुमार यूं चढ़ता हैं.......
एक खूबसूरत शेर हैं गौर फरमाइएगा
"लोग न जाने क्या क्या बातें करते हैं
उसके क़दम तो खुद-ब-खुदा इबादत के लिए चलते हैं..."
क्या करना उससे शिकवा, क्या बातें यारों
जो उपर-उपर हसता हैं, अन्दर अन्दर रोता हैं...
साहिल पर रहने वाले आखिर क्या जाने
तूफानों में कौन डूबता हैं, कौन उभरता हैं...
मुहब्बत में खुमार यूं चढ़ता हैं...
इंसान खुद को खुदा समझता हैं...
होश में ऐसा आये तोह यह कैसा आये
जो दूसरों का हाल देख कर भी नहीं संभलता हैं...
बेवफाई पर भी दुआ हाथ के लिए उठ जाये
मुहब्बत में खुमार यूं चढ़ता हैं...
इंसान खुद को खुदा समझता हैं...
इंसान खुद को खुदा समझता हैं...
[copyright reserved]
इंसान खुद को खुदा समझता हैं...
मत करो उससे ईमान की बात यारों
जो महबूब के सजदे में सर झुकाए रहता हैं...
मुहब्बत में खुमार यूं चढ़ता हैं.......
एक खूबसूरत शेर हैं गौर फरमाइएगा
"लोग न जाने क्या क्या बातें करते हैं
उसके क़दम तो खुद-ब-खुदा इबादत के लिए चलते हैं..."
क्या करना उससे शिकवा, क्या बातें यारों
जो उपर-उपर हसता हैं, अन्दर अन्दर रोता हैं...
साहिल पर रहने वाले आखिर क्या जाने
तूफानों में कौन डूबता हैं, कौन उभरता हैं...
मुहब्बत में खुमार यूं चढ़ता हैं...
इंसान खुद को खुदा समझता हैं...
होश में ऐसा आये तोह यह कैसा आये
जो दूसरों का हाल देख कर भी नहीं संभलता हैं...
बेवफाई पर भी दुआ हाथ के लिए उठ जाये
मुहब्बत में खुमार यूं चढ़ता हैं...
इंसान खुद को खुदा समझता हैं...
इंसान खुद को खुदा समझता हैं...
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